कैसे गुज़र रही है सब पूछते है, कैसे गुजारता हु कोई नहीं पूछता |

ज़िन्दगी के हाथ नहीं होते.. लेकिन कभी कभी वो ऐसा थप्पड़ मारती हैं जो पूरी उम्र याद रहता है

क्यूँ नहीं महसूस होती उसे मेरी तकलीफ़ जो कहते थे बहुत अच्छे से जानते है तुझे

तुमको भी कहाँ जरूरत है मेरी, तुम्हारे लिये तो मैं भी बिछड़ा हुआ जमाना हूँ.....!!

तुम्हारे बिना रह तो सकती हूँ... मगर.. खुश नहीं रह सकती

वो शख्स एक छोटी सी बात पे यूँ चल दिया, जैसे उसे सदियों से किसी बहाने की तलाश थी .

खामोशियां बेवजह नहीं होती, कुछ दर्द आवाज छीन लिया करते हैं.

जिसके हो नहीं सकते उसी के हो रहे हैं हम...

शिकायत तो खुद से है तुम से तो आज भी इश्क़ है

किसी रोज़ मिलने से प्यार हो या न हो लेकिन किसी रोज़ बात करने से उसकी आदत जरूर हो जाती है

उस हंसती हुई तस्वीर को क्या मालूम की कोई उसे देख कितने रोता है

वो मन बना चुके थे दूर जाने का, हमे लगा हमे मनाना नहीं आता