मुँह पर सच बोलने की आदत है इसलिए मै बहुत बत्तमीज हूँ.

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तंग नहीं करते हम उन्हें आजकल, यह बात भी उन्हें तंग करती है.

समन्दर की तरह है हमारी पहचान ऊपर से खामोश और अंदर से तूफान

मस्त रेहता हूं अपनी मस्ती मैं, जाता नहीं मतलबी लोगो की बस्ती मैं

जैसा दोगे वैसा ही पाओगे.. फ़िर चाहे इज्ज़त हो या धोखा..!!

जमाना क्या लुटेगा हमारी खुशियों को, हम तो खुद खुशियाँ दूसरों पर लुटा कर जीते हैं

उस जगह पे हमेशा खामोश रहना जहाँ दो कौड़ी के लोग अपनी हैसियत के गुण गाते हैं

तंग नहीं करते हम उन्हें आजकल, यह बात भी उन्हें तंग करती है.

समन्दर की तरह है हमारी पहचान ऊपर से खामोश और अंदर से तूफान

मस्त रेहता हूं अपनी मस्ती मैं, जाता नहीं मतलबी लोगो की बस्ती मैं

जैसा दोगे वैसा ही पाओगे.. फ़िर चाहे इज्ज़त हो या धोखा..!!

जमाना क्या लुटेगा हमारी खुशियों को, हम तो खुद खुशियाँ दूसरों पर लुटा कर जीते हैं

उस जगह पे हमेशा खामोश रहना जहाँ दो कौड़ी के लोग अपनी हैसियत के गुण गाते हैं