हक़ से दे तो तेरी “नफरत” भी सर आँखों पर, खैरात में तो तेरी “मोहब्बत” भी मंजूर नहीं…!
रब देकर भी आजमाता है और ले कर भी .
अच्छा हुआ जो तुमने हमें तोड़कर रख दिया, घमंड था मुझे बहुत की तुम सिर्फ मेरे हो
में चुप हूँ कुछ वजह है जिस दिन बरस जाऊंगा उस दिन तरस भी नहीं खाऊंगा
पैसा "हैसियत" बदल सकता है, "औकात" नहीं.
गिरना अच्छा है औकात पता लगती है, कौन अपने साथ है ये बात पता लगती है
हक़ से दे तो तेरी “नफरत” भी सर आँखों पर, खैरात में तो तेरी “मोहब्बत” भी मंजूर नहीं…!
रब देकर भी आजमाता है और ले कर भी .
अच्छा हुआ जो तुमने हमें तोड़कर रख दिया, घमंड था मुझे बहुत की तुम सिर्फ मेरे हो
में चुप हूँ कुछ वजह है जिस दिन बरस जाऊंगा उस दिन तरस भी नहीं खाऊंगा
पैसा "हैसियत" बदल सकता है, "औकात" नहीं.
गिरना अच्छा है औकात पता लगती है, कौन अपने साथ है ये बात पता लगती है