अब मत्त खोलना मेरी ज़िन्दगी की पुरानी किताबों को जो था वो मैं रहा नहीं जो हूँ वो किसी को पता नहीं
जिंदगी को सफल बनाने के लिए बातों से नहीं, रातों से लड़ना पड़ता |
गुरूर मे इंसान को कभी इंसान नहीं देखता जैसे छत पर चढ़ जाओ तो अपना ही माकन नहीं देखता
जब मतलब न हो तो बोलना तो दूर लोग देखना तक छोड़ देते है
हम अपनी औकात जानते है कहो तो आपकी याद दिला दी
रब देकर भी आजमाता है और ले कर भी .
अब मत्त खोलना मेरी ज़िन्दगी की पुरानी किताबों को जो था वो मैं रहा नहीं जो हूँ वो किसी को पता नहीं
जिंदगी को सफल बनाने के लिए बातों से नहीं, रातों से लड़ना पड़ता |
गुरूर मे इंसान को कभी इंसान नहीं देखता जैसे छत पर चढ़ जाओ तो अपना ही माकन नहीं देखता
जब मतलब न हो तो बोलना तो दूर लोग देखना तक छोड़ देते है
हम अपनी औकात जानते है कहो तो आपकी याद दिला दी
रब देकर भी आजमाता है और ले कर भी .