जब भी जिंदगी रुलाये समझना गुनाह माफ़ हो गये...जब भी जिंदगी हँसाये समझना दुआ कुबूल हो गई...
इंसान सफल तब होता है जब वो जरूरत और चाहत के बीच फर्क समझ लेता है
जीवन मे सिर्फ वहाँ तक ही "झुकना' चाहिए जहाँ तक सम्बन्धो में "लचकता" और मन मे "आत्मसम्मान" बना रहे
कर्म सुख भले ही न ला सके, परंतु कर्म के बिना सुख नहीं मिलता
"जब तक किसी काम को किया नहीं जाता तब तक वह असंभव ही लगता है
मेरी मंजिल मेरे करीब है इसका मुझे एहसास है घमण्ड नहीं मुझे अपने इरादों पर ये मेरी सोच और हौसले का विश्वास है
जब भी जिंदगी रुलाये समझना गुनाह माफ़ हो गये...जब भी जिंदगी हँसाये समझना दुआ कुबूल हो गई...
इंसान सफल तब होता है जब वो जरूरत और चाहत के बीच फर्क समझ लेता है
जीवन मे सिर्फ वहाँ तक ही "झुकना' चाहिए जहाँ तक सम्बन्धो में "लचकता" और मन मे "आत्मसम्मान" बना रहे
कर्म सुख भले ही न ला सके, परंतु कर्म के बिना सुख नहीं मिलता
"जब तक किसी काम को किया नहीं जाता तब तक वह असंभव ही लगता है
मेरी मंजिल मेरे करीब है इसका मुझे एहसास है घमण्ड नहीं मुझे अपने इरादों पर ये मेरी सोच और हौसले का विश्वास है