इंसान का व्यक्तित्व तब ही उभर के आता है जब वो अपनो से ठोकर खाता है
ईश्वर ना काष्ठ में है, न मिट्टी में, न ही मूर्ति में. वह केवल भावना में होता है. अतः भावना ही मुख्य है.
शीशे की तरह चरित्रवान बनो ताकि लोग तुम्हे देखकर अपने चरित्र के दोषों को दूर करें जैसा कि वे शीशे को देखकर अपने चेहरे के दोषों को दूर करते हैं
अगर तुम्हें किसी काम के लिए खुद से ज्यादा किसी ओर का MOTIVATION चाहिए तो PLEASE भाई वो काम मत करो
अपने आप को हर परिश्थिति में शांत रहने के लिए तैयार करे.
"इतने बड़े बनो कि जब आप खड़े हों तो कोई बैठा न रहे !"
इंसान का व्यक्तित्व तब ही उभर के आता है जब वो अपनो से ठोकर खाता है
ईश्वर ना काष्ठ में है, न मिट्टी में, न ही मूर्ति में. वह केवल भावना में होता है. अतः भावना ही मुख्य है.
शीशे की तरह चरित्रवान बनो ताकि लोग तुम्हे देखकर अपने चरित्र के दोषों को दूर करें जैसा कि वे शीशे को देखकर अपने चेहरे के दोषों को दूर करते हैं
अगर तुम्हें किसी काम के लिए खुद से ज्यादा किसी ओर का MOTIVATION चाहिए तो PLEASE भाई वो काम मत करो
अपने आप को हर परिश्थिति में शांत रहने के लिए तैयार करे.
"इतने बड़े बनो कि जब आप खड़े हों तो कोई बैठा न रहे !"