इंसान का व्यक्तित्व तब ही उभर के आता है जब वो अपनो से ठोकर खाता है
मन में नित्य रहने वाले छः शत्रु – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य को जो वश में कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापों से ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होने वाले अनर्थों की तो बात ही क्या है।
खूबी और खामी दोनो ही होती है लोगों में आप क्या तलाशते हो ये महत्वपूर्ण है।
परेशानियां हमारी कमजोरियां साबित नही करती बल्कि यह बताती है कि हमे और
"संसार में ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जो आपके मन की शक्ति से अधिक शक्तिशाली हो।"
जो 'इन्सान' आपकी खुशी के लिये 'हार' मान लेता है उससे आप कभी 'जीत' नही सकते
इंसान का व्यक्तित्व तब ही उभर के आता है जब वो अपनो से ठोकर खाता है
मन में नित्य रहने वाले छः शत्रु – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य को जो वश में कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापों से ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होने वाले अनर्थों की तो बात ही क्या है।
खूबी और खामी दोनो ही होती है लोगों में आप क्या तलाशते हो ये महत्वपूर्ण है।
परेशानियां हमारी कमजोरियां साबित नही करती बल्कि यह बताती है कि हमे और
"संसार में ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जो आपके मन की शक्ति से अधिक शक्तिशाली हो।"
जो 'इन्सान' आपकी खुशी के लिये 'हार' मान लेता है उससे आप कभी 'जीत' नही सकते