क्रोध से भ्रम पैदा होता हैं, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती हैं… जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता हैं… जब तर्क नष्ट होता हैं तब व्यक्ति का पतन हो जाता हैं…
बात मुक्कदर पे आ के रुकी है वर्ना, कोई कसर तो न छोड़ी थी तुझे चाहने में !
क्रोध एक ऐसा श्राप हैं जो मनुष्य खुद को देता हैं…
क्रोध के कारण की तुलना में उसके परिणाम कितने गंभीर होते हैं!
जो व्यक्ति मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप से कह नहीं सकता, उसी को क्रोध अधिक आता हैं…
हर बार जब आप क्रोधित होते हैं, तब आप अपनी ही प्रणाली में ज़हर घोलते हैं.
क्रोध से भ्रम पैदा होता हैं, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती हैं… जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता हैं… जब तर्क नष्ट होता हैं तब व्यक्ति का पतन हो जाता हैं…
बात मुक्कदर पे आ के रुकी है वर्ना, कोई कसर तो न छोड़ी थी तुझे चाहने में !
क्रोध एक ऐसा श्राप हैं जो मनुष्य खुद को देता हैं…
क्रोध के कारण की तुलना में उसके परिणाम कितने गंभीर होते हैं!
जो व्यक्ति मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप से कह नहीं सकता, उसी को क्रोध अधिक आता हैं…
हर बार जब आप क्रोधित होते हैं, तब आप अपनी ही प्रणाली में ज़हर घोलते हैं.