रूठना तेरा लाज़मी था हर बार मनाने की आदत जो हमने डाली थी .
गिरते हुए पत्त्तों ने मुझे यह समझाया हैं बोझ बन जाओ तो अपनो भी गिरा देते हैं .
हमे पता है की तुम कहीं और के मुसाफिर हो, हमारा शहर तो यूँ ही बिच में आया था
रिश्ते वो होते हैं जिसमे शब्द कम और समझ ज्यादा हो......
अगर तुम्हें यकीं नहीं, तो कहने को कुछ नहीं मेरे पास, अगर तुम्हें यकीं है, तो मुझे कुछ कहने की जरूरत नही !
क्या इतने दूर निकल आये हैं हम, कि तेरे ख्यालों में भी नही आते ?
रूठना तेरा लाज़मी था हर बार मनाने की आदत जो हमने डाली थी .
गिरते हुए पत्त्तों ने मुझे यह समझाया हैं बोझ बन जाओ तो अपनो भी गिरा देते हैं .
हमे पता है की तुम कहीं और के मुसाफिर हो, हमारा शहर तो यूँ ही बिच में आया था
रिश्ते वो होते हैं जिसमे शब्द कम और समझ ज्यादा हो......
अगर तुम्हें यकीं नहीं, तो कहने को कुछ नहीं मेरे पास, अगर तुम्हें यकीं है, तो मुझे कुछ कहने की जरूरत नही !
क्या इतने दूर निकल आये हैं हम, कि तेरे ख्यालों में भी नही आते ?