कोरा कागज़ था और कुछ बिखरे हुए लफ़्ज़... ज़िक्र तेरा आया तो सारा कागज़ गुलाबी हो गया...!
तेरी मोहब्बत को कभी खेल नही समजा, वरना खेल तो इतने खेले है कि कभी हारे नही….!
लफ्ज ढाई अक्षर ही थे.....कभी प्यार बन गए तो कभी जख्म.......
मैं क्यों पुकारू उसे कि लोट आओ उसे खबर नहीं कि कुछ नहीं मेरे पास उसके सिवाए.
अब तो मोहब्बत भी सरकारी नौकरी जैसी लगती है, कम्बख्त ग़रीबों को तो मिलती ही नहीं
आज भी एक सवाल छिपा है.. दिल के किसी कोने मैं.. की क्या कमी रह गई थी तेरा होने में.
कोरा कागज़ था और कुछ बिखरे हुए लफ़्ज़... ज़िक्र तेरा आया तो सारा कागज़ गुलाबी हो गया...!
तेरी मोहब्बत को कभी खेल नही समजा, वरना खेल तो इतने खेले है कि कभी हारे नही….!
लफ्ज ढाई अक्षर ही थे.....कभी प्यार बन गए तो कभी जख्म.......
मैं क्यों पुकारू उसे कि लोट आओ उसे खबर नहीं कि कुछ नहीं मेरे पास उसके सिवाए.
अब तो मोहब्बत भी सरकारी नौकरी जैसी लगती है, कम्बख्त ग़रीबों को तो मिलती ही नहीं
आज भी एक सवाल छिपा है.. दिल के किसी कोने मैं.. की क्या कमी रह गई थी तेरा होने में.