लिखना तो ये था कि खुश हूँ तेरे बगैर भी, पर कलम से पहले आँसू कागज़ पर गिर गया
कभी कभी बहुत सताता है यह सवाल मुझे, हम मिले ही क्यों थे, जब हमें मिलना ही नहीं था
बोहुत भीड़ है मोहब्बत के इस शेहेर में, एक बार जो बिछड़ा वापस नहीं मिलता
जो आँसू आँख से अचानक निकल पड़ें, वजह उनकी ज़बान से बयां नहीं होती।
लिखना तो था कि खुश हूँ तेरे वगैर भी, आँसू मगर कलम से पहले ही गिर पड़े।
वहाँ से पानी की एक बूँद भी न निकली, तमाम उम्र जिन आँखों को झील लिखते रहे।
लिखना तो ये था कि खुश हूँ तेरे बगैर भी, पर कलम से पहले आँसू कागज़ पर गिर गया
कभी कभी बहुत सताता है यह सवाल मुझे, हम मिले ही क्यों थे, जब हमें मिलना ही नहीं था
बोहुत भीड़ है मोहब्बत के इस शेहेर में, एक बार जो बिछड़ा वापस नहीं मिलता
जो आँसू आँख से अचानक निकल पड़ें, वजह उनकी ज़बान से बयां नहीं होती।
लिखना तो था कि खुश हूँ तेरे वगैर भी, आँसू मगर कलम से पहले ही गिर पड़े।
वहाँ से पानी की एक बूँद भी न निकली, तमाम उम्र जिन आँखों को झील लिखते रहे।