अक्सर वही लोग उठाते हैं हम पर उंगलिया, जिनकी हमें छूने की औकात नहीं होती।
"क्रोध मस्तिष्क के दीपक को बुझा देता है | अतः हमें सदैव शांत व स्थिरचित्त रहना चाहिए |"
"जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में नहीं कह सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है |"
सुधरी हे तो बस मेरी आदते वरना मेरे शौक, वो तो आज भी तेरी औकात से ऊँचे हैं…!!!
ये भी अच्छा है कि ये सिर्फ़ सुनता है, दिल अगर बोलता तो क़यामत हो जाती।
जिनकी नज़रों में हम अच्छे नही, वो अपनी आँखो का इलाज करवाये.
अक्सर वही लोग उठाते हैं हम पर उंगलिया, जिनकी हमें छूने की औकात नहीं होती।
"क्रोध मस्तिष्क के दीपक को बुझा देता है | अतः हमें सदैव शांत व स्थिरचित्त रहना चाहिए |"
"जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में नहीं कह सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है |"
सुधरी हे तो बस मेरी आदते वरना मेरे शौक, वो तो आज भी तेरी औकात से ऊँचे हैं…!!!
ये भी अच्छा है कि ये सिर्फ़ सुनता है, दिल अगर बोलता तो क़यामत हो जाती।
जिनकी नज़रों में हम अच्छे नही, वो अपनी आँखो का इलाज करवाये.