ऐ ईश्क सुना था के… तु अंन्धा है फिर मेरे धर का राश्ता तुजे कीसने बताया
हजारो बार ली हैं तलाशियाँ तुमने मेरे दिल की, बताओ कभी कुछ मिला है तुम्हारे सिवा !
ग़ालिब ने खूब कहा है - ऐ चाँद तू किस मज़हब का है, ईद भी तेरी और करवाचौथ भी तेरा
जानते हो मोहब्बत किसे कहते हैं किसी को दिल से चाहना उसे हार जाना और फिर खामोश रहना
तू मिले या न मिले ये तो मुक़द्दर की बात है मगर सुकून बहुत मिलता है तुझे अपना सोच कर
खामोशियाँ बोल देती हैं जिनकी बाते नहीं होती, इश्क़ वो भी करते हैं जिनकी मुलाक़ाते नहीं होती
ऐ ईश्क सुना था के… तु अंन्धा है फिर मेरे धर का राश्ता तुजे कीसने बताया
हजारो बार ली हैं तलाशियाँ तुमने मेरे दिल की, बताओ कभी कुछ मिला है तुम्हारे सिवा !
ग़ालिब ने खूब कहा है - ऐ चाँद तू किस मज़हब का है, ईद भी तेरी और करवाचौथ भी तेरा
जानते हो मोहब्बत किसे कहते हैं किसी को दिल से चाहना उसे हार जाना और फिर खामोश रहना
तू मिले या न मिले ये तो मुक़द्दर की बात है मगर सुकून बहुत मिलता है तुझे अपना सोच कर
खामोशियाँ बोल देती हैं जिनकी बाते नहीं होती, इश्क़ वो भी करते हैं जिनकी मुलाक़ाते नहीं होती