अजीब सी दुनिया है, अजीब से ठिकाने है, यहाँ लोग मिलते कम है, झाकते ज्यादा है...

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हारने वालो का भी अपना रुतबा होता हैं … मलाल वो करे जो दौड़ में शामिल नही थे..

क्रोध के कारण की तुलना में उसके परिणाम कितने गंभीर होते हैं।

शहर भर मेँ एक ही पहचान है ‘हमारी’ सुर्ख आँखे, गुस्सैल चेहरा और नवाबी अदायेँ’!

बात मुक्कदर पे आ के रुकी है वर्ना, कोई कसर तो न छोड़ी थी तुझे चाहने में !

"जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में नहीं कह सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है |"

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

हर बार जब आप क्रोधित होते हैं, तब आप अपनी ही प्रणाली में ज़हर घोलते हैं।

हारने वालो का भी अपना रुतबा होता हैं … मलाल वो करे जो दौड़ में शामिल नही थे..

क्रोध के कारण की तुलना में उसके परिणाम कितने गंभीर होते हैं।

शहर भर मेँ एक ही पहचान है ‘हमारी’ सुर्ख आँखे, गुस्सैल चेहरा और नवाबी अदायेँ’!

बात मुक्कदर पे आ के रुकी है वर्ना, कोई कसर तो न छोड़ी थी तुझे चाहने में !

"जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में नहीं कह सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है |"

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

हर बार जब आप क्रोधित होते हैं, तब आप अपनी ही प्रणाली में ज़हर घोलते हैं।