"सार्वजनिक" रूप से की गई "आलोचना" अपमान में बदल जाती है और .... "एकांत" में बताने पर "सलाह" बन जाती है...!!
मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही दुःख भोगता है, अकेला ही मोक्ष का अधिकारी होता है और अकेला ही नरक जाता है. अतः रिश्ते-नाते तो क्षण भंगुर हैं, हमें अकेले ही दुनिया के मंच पर अभिनय करना पड़ता है.
ज़िन्दगी में जब तक भागते भागते काम करो जब तक सोते सोते पैसा आना शुरू न हो जाये
नेत्र केवल हमे दृष्टि प्रदान करते है परंतु हम कब.. किसमे क्या देखते है ये हमारी भावनाओ पर निर्भर करता है।
दुनिया में कोई भी चीज़ कितनी भी कीमती क्यों न हो। परन्तु.... नींद,शांति,और आनन्द से बढ़कर कुछ भी नही।
वक्त होता है बदलने के लिए, ठहरते तो बस लम्हे ही हैं ....!!
"सार्वजनिक" रूप से की गई "आलोचना" अपमान में बदल जाती है और .... "एकांत" में बताने पर "सलाह" बन जाती है...!!
मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही दुःख भोगता है, अकेला ही मोक्ष का अधिकारी होता है और अकेला ही नरक जाता है. अतः रिश्ते-नाते तो क्षण भंगुर हैं, हमें अकेले ही दुनिया के मंच पर अभिनय करना पड़ता है.
ज़िन्दगी में जब तक भागते भागते काम करो जब तक सोते सोते पैसा आना शुरू न हो जाये
नेत्र केवल हमे दृष्टि प्रदान करते है परंतु हम कब.. किसमे क्या देखते है ये हमारी भावनाओ पर निर्भर करता है।
दुनिया में कोई भी चीज़ कितनी भी कीमती क्यों न हो। परन्तु.... नींद,शांति,और आनन्द से बढ़कर कुछ भी नही।
वक्त होता है बदलने के लिए, ठहरते तो बस लम्हे ही हैं ....!!