झूठ बोलते थे कितना, फिर भी सच्चे थे हम ये उन दिनों की बात है, जब बच्चे थे हम!
बारिश की बूँदों में झलकती है तस्वीर उनकी और हम उनसे मिलनें की चाहत में भीग जाते हैं…
मुझे गरुर था उसकी मोह्ब्बत पर, वो अपनी शोहरत मे हमे भूल गया.
हम तुम्हें मुफ़्त में जो मिले हैं, क़दर ना करना हक़ है तुम्हारा.
खो जाओ मुझ में तो मालूम हो कि दर्द क्या है? ये वो किस्सा है जो जुबान से बयाँ नही होता।
जिसकी सजा तुम हो, मुझे ऐसा गुनाह करना हैं!
झूठ बोलते थे कितना, फिर भी सच्चे थे हम ये उन दिनों की बात है, जब बच्चे थे हम!
बारिश की बूँदों में झलकती है तस्वीर उनकी और हम उनसे मिलनें की चाहत में भीग जाते हैं…
मुझे गरुर था उसकी मोह्ब्बत पर, वो अपनी शोहरत मे हमे भूल गया.
हम तुम्हें मुफ़्त में जो मिले हैं, क़दर ना करना हक़ है तुम्हारा.
खो जाओ मुझ में तो मालूम हो कि दर्द क्या है? ये वो किस्सा है जो जुबान से बयाँ नही होता।
जिसकी सजा तुम हो, मुझे ऐसा गुनाह करना हैं!