क्रोध वह हवा है जो बुद्धि के दीप को बुझा देती है.
गुस्से में बोला गया एक कठोर शब्द इतना जहरीला बन सकता हैं कि आपकी हजार प्यारी बातों को एक मिनट में नष्ट कर सकता हैं…
क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु हैं जो इस शत्रु को अपने नियंत्रण में रखता हैं उसके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती हैं…
"क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रांत हो जाती है, स्मृति भ्रांत हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि नष्ट होने पर प्राणी स्वयं नष्ट हो जाता है।"
ये भी अच्छा है कि ये सिर्फ़ सुनता है, दिल अगर बोलता तो क़यामत हो जाती।
जब सहनशीलता की सीमा पार करती है, तब प्रतिशोध की चिंगारी उठती है । यह चिंगारी क्रोध की ज्वाला बन जाती है, और फिर ज्वाला कहाँ देखती है कि, अपना घर जल रहा है, या दुश्मन का ।
क्रोध वह हवा है जो बुद्धि के दीप को बुझा देती है.
गुस्से में बोला गया एक कठोर शब्द इतना जहरीला बन सकता हैं कि आपकी हजार प्यारी बातों को एक मिनट में नष्ट कर सकता हैं…
क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु हैं जो इस शत्रु को अपने नियंत्रण में रखता हैं उसके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती हैं…
"क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रांत हो जाती है, स्मृति भ्रांत हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि नष्ट होने पर प्राणी स्वयं नष्ट हो जाता है।"
ये भी अच्छा है कि ये सिर्फ़ सुनता है, दिल अगर बोलता तो क़यामत हो जाती।
जब सहनशीलता की सीमा पार करती है, तब प्रतिशोध की चिंगारी उठती है । यह चिंगारी क्रोध की ज्वाला बन जाती है, और फिर ज्वाला कहाँ देखती है कि, अपना घर जल रहा है, या दुश्मन का ।