लफ्ज ढाई अक्षर ही थे.....कभी प्यार बन गए तो कभी जख्म.......
मुझ से पहले भी उसका कोई था मेरे बाद भी उसका कोई है
मै तब भी अकेला नहीं था, नहीं आज भी हु, तब यारो का काफिला था, आज यादो का कांरवा है
उसको मालूम तो हैं मेरे हालातो के बारे मे, फिर खैरियत पूछकर मेरी मुश्किलें क्यों बढ़ाते हैं |
इस दुनिया के लोग भी कितने अजीब है ना, सारे खिलौने छोड़ कर जज़बातों से खेलते हैं
दिल धोखे में है और धोखेबाज़ दिल में
लफ्ज ढाई अक्षर ही थे.....कभी प्यार बन गए तो कभी जख्म.......
मुझ से पहले भी उसका कोई था मेरे बाद भी उसका कोई है
मै तब भी अकेला नहीं था, नहीं आज भी हु, तब यारो का काफिला था, आज यादो का कांरवा है
उसको मालूम तो हैं मेरे हालातो के बारे मे, फिर खैरियत पूछकर मेरी मुश्किलें क्यों बढ़ाते हैं |
इस दुनिया के लोग भी कितने अजीब है ना, सारे खिलौने छोड़ कर जज़बातों से खेलते हैं
दिल धोखे में है और धोखेबाज़ दिल में