लफ्ज ढाई अक्षर ही थे.....कभी प्यार बन गए तो कभी जख्म.......
चुप रहना मेरी ताक़त है कमज़ोरी नहीं, अकेले रहना मेरी चाहत है, मजबूरी नहीं।
ज़िन्दगी से भला क्या शिकायत करें बस जिसे चाहा उसने समझा ही नही
उसको मालूम तो हैं मेरे हालातो के बारे मे, फिर खैरियत पूछकर मेरी मुश्किलें क्यों बढ़ाते हैं |
जो ज़ख़्म लगे हुए हैं दिल पर उनका मर्ज़ क्या होता है महफ़िल वालों तुम क्या जानो तन्हाई का दर्द क्या होता है....
शाम नहीं पर बात वही. तू नहीं तो तेरी याद सही.
लफ्ज ढाई अक्षर ही थे.....कभी प्यार बन गए तो कभी जख्म.......
चुप रहना मेरी ताक़त है कमज़ोरी नहीं, अकेले रहना मेरी चाहत है, मजबूरी नहीं।
ज़िन्दगी से भला क्या शिकायत करें बस जिसे चाहा उसने समझा ही नही
उसको मालूम तो हैं मेरे हालातो के बारे मे, फिर खैरियत पूछकर मेरी मुश्किलें क्यों बढ़ाते हैं |
जो ज़ख़्म लगे हुए हैं दिल पर उनका मर्ज़ क्या होता है महफ़िल वालों तुम क्या जानो तन्हाई का दर्द क्या होता है....
शाम नहीं पर बात वही. तू नहीं तो तेरी याद सही.