उसे क्या फर्क पड़ता है बिछड़ने क्या, सच्ची मोहबत तो मेरी थी उसकी तो नही थी
आवाज़ नहीं होती दिल टूटने की. लेकिन तकलीफ बहुत होती हैं.
कभी मौका मिले तो सोचना ज़रूर कि एक लापरवाह शख़्स तेरी इतनी परवाह क्यूं करता है
"उतर जाते है कुछ लोग दिल में इस कदर इन्हे दिल से निकालो तो जान निकल जाती है..."
पता है तकलीफ क्या है किसी को चाहना फिर उसे खो देना और खामोश हो जाना
हमारा उसका अब रिश्ता न पूछो तालुक तो है मगर टुटा हुआ है
उसे क्या फर्क पड़ता है बिछड़ने क्या, सच्ची मोहबत तो मेरी थी उसकी तो नही थी
आवाज़ नहीं होती दिल टूटने की. लेकिन तकलीफ बहुत होती हैं.
कभी मौका मिले तो सोचना ज़रूर कि एक लापरवाह शख़्स तेरी इतनी परवाह क्यूं करता है
"उतर जाते है कुछ लोग दिल में इस कदर इन्हे दिल से निकालो तो जान निकल जाती है..."
पता है तकलीफ क्या है किसी को चाहना फिर उसे खो देना और खामोश हो जाना
हमारा उसका अब रिश्ता न पूछो तालुक तो है मगर टुटा हुआ है