जैसे फलों में गंध, तिलों में तेल, काष्ठ में अग्नि, दुग्ध में घी, गन्ने में गुड़ है, उसी तरह शरीर में परमात्मा है. इसे पहचानना चाहिए.
किस्मत सिर्फ मेहनत करने से बदलती है बैठ कर सोचते रहने से नहीं
कोई भी "व्यक्ति" हमारा "मित्र" या "शत्रु" बनकर "संसार" में नही आता हमारा "व्यवहार" और "शब्द" ही लोगो को "मित्र" और "शत्रु" बनाते है
एक परवाह ही तो बताती है कि कौन किसका कितना ख्याल रखता है. वरना रिश्तों की गहराइयों को मापने का कोई तराजू नहीं होता है
बुढ़ापे में आपको रोटी आपकी औलाद नहीं आपके दिए संस्कार खिलाएंगे
फोकस खुद पे करो जब तक लोग तुम पर फोकस ना करे
जैसे फलों में गंध, तिलों में तेल, काष्ठ में अग्नि, दुग्ध में घी, गन्ने में गुड़ है, उसी तरह शरीर में परमात्मा है. इसे पहचानना चाहिए.
किस्मत सिर्फ मेहनत करने से बदलती है बैठ कर सोचते रहने से नहीं
कोई भी "व्यक्ति" हमारा "मित्र" या "शत्रु" बनकर "संसार" में नही आता हमारा "व्यवहार" और "शब्द" ही लोगो को "मित्र" और "शत्रु" बनाते है
एक परवाह ही तो बताती है कि कौन किसका कितना ख्याल रखता है. वरना रिश्तों की गहराइयों को मापने का कोई तराजू नहीं होता है
बुढ़ापे में आपको रोटी आपकी औलाद नहीं आपके दिए संस्कार खिलाएंगे
फोकस खुद पे करो जब तक लोग तुम पर फोकस ना करे