जो मज़ा अपनी पहचान बनाने मे है.. वो किसी और की परछाई बनने मे कहा..!
मौज़ लो, रोज़ लो, ना मिले तो ख़ोज लो
रिश्ते उन्ही से बनाओ, जो निभाने की ओकात रखते हो..
सच है जब इंसान की जरूरत बदल जाती है तो उसका बात करने का तरीका भी बदल जाता है
बोलना तो सब जानते हैं पर कब और क्या बोलना है यह बहुत ही कम लोग जानते हैं
आज तक एसी कोई रानी नही बनी जो इस बादशाह को अपना गुलाम बना सके
जो मज़ा अपनी पहचान बनाने मे है.. वो किसी और की परछाई बनने मे कहा..!
मौज़ लो, रोज़ लो, ना मिले तो ख़ोज लो
रिश्ते उन्ही से बनाओ, जो निभाने की ओकात रखते हो..
सच है जब इंसान की जरूरत बदल जाती है तो उसका बात करने का तरीका भी बदल जाता है
बोलना तो सब जानते हैं पर कब और क्या बोलना है यह बहुत ही कम लोग जानते हैं
आज तक एसी कोई रानी नही बनी जो इस बादशाह को अपना गुलाम बना सके