जो मेरा होता है उस पर किसी का हक़ तो क्या नज़र तक बर्दाश्त नहीं करती मै
दुसरो की शर्तो पर सुल्तान बनने से कई गुना ज्यादा बेहतर है अपनी ही मौज का फकीर बने रहना
तुम सिर्फ मेरे हो अब इससे प्यार समझो या क़ब्ज़ा
पत्थर सा बदनाम हूँ साहब, अपने शहर में आईना कहीं भी टूटे नाम मेरा ही आता है
तंग नहीं करते हम उन्हें आजकल, यह बात भी उन्हें तंग करती है.
कौन कब किसका और कितना अपना है ..यह सिर्फ वक़्त बताता है
जो मेरा होता है उस पर किसी का हक़ तो क्या नज़र तक बर्दाश्त नहीं करती मै
दुसरो की शर्तो पर सुल्तान बनने से कई गुना ज्यादा बेहतर है अपनी ही मौज का फकीर बने रहना
तुम सिर्फ मेरे हो अब इससे प्यार समझो या क़ब्ज़ा
पत्थर सा बदनाम हूँ साहब, अपने शहर में आईना कहीं भी टूटे नाम मेरा ही आता है
तंग नहीं करते हम उन्हें आजकल, यह बात भी उन्हें तंग करती है.
कौन कब किसका और कितना अपना है ..यह सिर्फ वक़्त बताता है