अकेले चलने वाले लोग घंमडी नहीं होते वो बस अकेले ही काफी होते है
वक़्त वक़्त की बात है, हर कोई मतलब तक साथ है
हक़ से दे तो तेरी “नफरत” भी सर आँखों पर, खैरात में तो तेरी “मोहब्बत” भी मंजूर नहीं…!
जमाना क्या लुटेगा हमारी खुशियों को, हम तो खुद खुशियाँ दूसरों पर लुटा कर जीते हैं
शायरी का बादशाह हुं और कलम मेरी रानी, अल्फाज़ मेरे गुलाम है, बाकी रब की महेरबानी
जो सुधर जाये वह हम नहीं और हमे कोई सुधार दे इतना किसी में दम नहीं
अकेले चलने वाले लोग घंमडी नहीं होते वो बस अकेले ही काफी होते है
वक़्त वक़्त की बात है, हर कोई मतलब तक साथ है
हक़ से दे तो तेरी “नफरत” भी सर आँखों पर, खैरात में तो तेरी “मोहब्बत” भी मंजूर नहीं…!
जमाना क्या लुटेगा हमारी खुशियों को, हम तो खुद खुशियाँ दूसरों पर लुटा कर जीते हैं
शायरी का बादशाह हुं और कलम मेरी रानी, अल्फाज़ मेरे गुलाम है, बाकी रब की महेरबानी
जो सुधर जाये वह हम नहीं और हमे कोई सुधार दे इतना किसी में दम नहीं