"सार्वजनिक" रूप से की गई "आलोचना" अपमान में बदल जाती है और .... "एकांत" में बताने पर "सलाह" बन जाती है...!!
कुछ बनना है तो शौक से बनो,पर खयाल रखना की भीड़ का हिस्सा मत बनो हाँ, भीड़ जिसके लिए जुटे वो किस्सा जरुर बनो
ज़िन्दगी में यही देखना ज़रूरी नहीं है, कि कौन हमारे आगे है या कौन हमारे पीछे.... कभी यह भी देखना चाहिये कि, हम किसके साथ हैं, और कौन हमारे साथ है.....
मेहनत लगती है सपनों को सच बनाने में, हौसला लगता है बुलन्दियों को पाने में, बरसो लगते है जिन्दगी बनाने में, और जिन्दगी फिर भी कम पडती है रिश्ते निभाने में।!
मूर्ख को उपदेश शत्रु के समान लगता है. लोभियों अथवा कंजूसो को याचक (भिखारी) शत्रु सा लगता है. व्यभिचारिणी स्त्री को उसका पति शत्रु लगता है, तो चोरों को चंद्रमा शत्रु लगता है.
सफ़लता की खुशियां मनाना ठीक है, लेकिन असफलताओं से सबक सीखना अधिक महत्वपूर्ण है।
"सार्वजनिक" रूप से की गई "आलोचना" अपमान में बदल जाती है और .... "एकांत" में बताने पर "सलाह" बन जाती है...!!
कुछ बनना है तो शौक से बनो,पर खयाल रखना की भीड़ का हिस्सा मत बनो हाँ, भीड़ जिसके लिए जुटे वो किस्सा जरुर बनो
ज़िन्दगी में यही देखना ज़रूरी नहीं है, कि कौन हमारे आगे है या कौन हमारे पीछे.... कभी यह भी देखना चाहिये कि, हम किसके साथ हैं, और कौन हमारे साथ है.....
मेहनत लगती है सपनों को सच बनाने में, हौसला लगता है बुलन्दियों को पाने में, बरसो लगते है जिन्दगी बनाने में, और जिन्दगी फिर भी कम पडती है रिश्ते निभाने में।!
मूर्ख को उपदेश शत्रु के समान लगता है. लोभियों अथवा कंजूसो को याचक (भिखारी) शत्रु सा लगता है. व्यभिचारिणी स्त्री को उसका पति शत्रु लगता है, तो चोरों को चंद्रमा शत्रु लगता है.
सफ़लता की खुशियां मनाना ठीक है, लेकिन असफलताओं से सबक सीखना अधिक महत्वपूर्ण है।