खुद की समझदारी भी
यदि तुम्हारा पड़ोसी भूखा है तो मंदिर में प्रसाद चढ़ाना पाप है
हमारी हार इसमें नहीं है की कोई दूसरा हमे नहीं पहचानता, हार इसमें है की हम खुद अपने आप को नहीं पहचान पाते
क्रोध हवा का वह झोंका है, जो बुद्धि के दीपक को बुझा देता है जिनकी भाषा में सभ्यता होती है उनके जीवन में सदैव भव्यता होती है.
खूबी और खामी दोनो ही होती है लोगों में आप क्या तलाशते हो ये महत्वपूर्ण है।
समय अच्छा हो तो बन जाते है सभी साथी लेकिन समय मुश्किल हो तो खुद पे भारोश रखना..
खुद की समझदारी भी
यदि तुम्हारा पड़ोसी भूखा है तो मंदिर में प्रसाद चढ़ाना पाप है
हमारी हार इसमें नहीं है की कोई दूसरा हमे नहीं पहचानता, हार इसमें है की हम खुद अपने आप को नहीं पहचान पाते
क्रोध हवा का वह झोंका है, जो बुद्धि के दीपक को बुझा देता है जिनकी भाषा में सभ्यता होती है उनके जीवन में सदैव भव्यता होती है.
खूबी और खामी दोनो ही होती है लोगों में आप क्या तलाशते हो ये महत्वपूर्ण है।
समय अच्छा हो तो बन जाते है सभी साथी लेकिन समय मुश्किल हो तो खुद पे भारोश रखना..