इंसान के अंदर ही समा जाए, वो स्वाभिमान होता है... और जो बाहर छलक जाए वो अभिमान होता है...
शर्म की अमीरी से इज्जत की गरीबी अच्छी है।
हर किसी पर यकीन ना करे क्योंकि नमक और शक्कर का रंग एक जैसा होता है
अगर खुद का मूल्य पता लग जाए, तो दूसरों द्वारा की गई अनावश्यक निंदा, तुम्हे छू भी नही सकती..
किसी व्यक्ति के प्रति इतना भी समर्पण नही होना चाहिये की आप स्वयं को धीरे धीरे खोने लगे
मेरी मंजिल मेरे करीब है इसका मुझे एहसास है घमण्ड नहीं मुझे अपने इरादों पर ये मेरी सोच और हौसले का विश्वास है
इंसान के अंदर ही समा जाए, वो स्वाभिमान होता है... और जो बाहर छलक जाए वो अभिमान होता है...
शर्म की अमीरी से इज्जत की गरीबी अच्छी है।
हर किसी पर यकीन ना करे क्योंकि नमक और शक्कर का रंग एक जैसा होता है
अगर खुद का मूल्य पता लग जाए, तो दूसरों द्वारा की गई अनावश्यक निंदा, तुम्हे छू भी नही सकती..
किसी व्यक्ति के प्रति इतना भी समर्पण नही होना चाहिये की आप स्वयं को धीरे धीरे खोने लगे
मेरी मंजिल मेरे करीब है इसका मुझे एहसास है घमण्ड नहीं मुझे अपने इरादों पर ये मेरी सोच और हौसले का विश्वास है