“अगर प्यार है तो शक़ कैसा …अगर नहीं है तो हक़ कैसा
ए इश्क़, तू ही बता, मैं तेरा अब, क्या हश्र करूँ - दिल जलाऊँ, आँखों से बहाऊँ, या रूह में क़ैद करूँ
उसकी मुहब्बत का सिलसिला भी क्या अजीब है, अपना भी नहीं बनाती और किसी का होने भी नहीं देती
तू करे ना करे..... मेरा इश़्क काफ़ी है... हम दोनों के लिये
ऐ ईश्क सुना था के… तु अंन्धा है फिर मेरे धर का राश्ता तुजे कीसने बताया
वो ना ही मिलते तो अच्छा था… बेकार में मोहब्बत से नफ़रत हो गई…
“अगर प्यार है तो शक़ कैसा …अगर नहीं है तो हक़ कैसा
ए इश्क़, तू ही बता, मैं तेरा अब, क्या हश्र करूँ - दिल जलाऊँ, आँखों से बहाऊँ, या रूह में क़ैद करूँ
उसकी मुहब्बत का सिलसिला भी क्या अजीब है, अपना भी नहीं बनाती और किसी का होने भी नहीं देती
तू करे ना करे..... मेरा इश़्क काफ़ी है... हम दोनों के लिये
ऐ ईश्क सुना था के… तु अंन्धा है फिर मेरे धर का राश्ता तुजे कीसने बताया
वो ना ही मिलते तो अच्छा था… बेकार में मोहब्बत से नफ़रत हो गई…