गुल्लक की तरह था रिश्ता हमारा जब टूटा तब कीमत समझ में आई
जिनको मेरी फ़िक्र नहीं उनका अब से कोई ज़िक्र नहीं
दिल पर लग जाती है उन्हें अक्सर हमारी बातें, जो कहते थे तुम कुछ भी बोलो बुरा नहीं लगता...
क्या औकात है तेरी ए ज़िंदगी.. चार दिन की मोहब्बत तुझे बरबाद कर देती है..
वो जो हमसे नफरत करते हैं, हम तो आज भी सिर्फ उन पर मरते हैं,
वो जा रहा है छोड़ कर..बताओ रास्ता दूँ या वास्ता दूँ...?
गुल्लक की तरह था रिश्ता हमारा जब टूटा तब कीमत समझ में आई
जिनको मेरी फ़िक्र नहीं उनका अब से कोई ज़िक्र नहीं
दिल पर लग जाती है उन्हें अक्सर हमारी बातें, जो कहते थे तुम कुछ भी बोलो बुरा नहीं लगता...
क्या औकात है तेरी ए ज़िंदगी.. चार दिन की मोहब्बत तुझे बरबाद कर देती है..
वो जो हमसे नफरत करते हैं, हम तो आज भी सिर्फ उन पर मरते हैं,
वो जा रहा है छोड़ कर..बताओ रास्ता दूँ या वास्ता दूँ...?