हमे पता है की तुम कहीं और के मुसाफिर हो, हमारा शहर तो यूँ ही बिच में आया था
मुझमें ही हौसला नहीं वरना .. छत का पंखा पुकारता है मुझे....
दर्द सहने की कुछ यु आदत सी हो गई है.... की अब दर्द न मिले तो दर्द सा होता है
आंधी आती है, तो पेड़ से पत्ते टूट जाते है नया बाबू मिलते ही पुराने छूट जाते हैं
फरक तो उन्हें पढता है जिनके पास एक हो उन्हें क्या फरक पढ़ेगा जिनके पास हजारों हैं
जब कोई आपकी नाराज़गी की फ़िक्र करना छोड़ दे तो समझ लेना रिश्ता ख़तम मजबूरी शुरू
हमे पता है की तुम कहीं और के मुसाफिर हो, हमारा शहर तो यूँ ही बिच में आया था
मुझमें ही हौसला नहीं वरना .. छत का पंखा पुकारता है मुझे....
दर्द सहने की कुछ यु आदत सी हो गई है.... की अब दर्द न मिले तो दर्द सा होता है
आंधी आती है, तो पेड़ से पत्ते टूट जाते है नया बाबू मिलते ही पुराने छूट जाते हैं
फरक तो उन्हें पढता है जिनके पास एक हो उन्हें क्या फरक पढ़ेगा जिनके पास हजारों हैं
जब कोई आपकी नाराज़गी की फ़िक्र करना छोड़ दे तो समझ लेना रिश्ता ख़तम मजबूरी शुरू