“वो रोए तो बहुत, पर मुझसे मूह मोड़ कर रोए, कोई मजबूरी होगी तो दिल तोड़ कर रोए
क्या इतने दूर निकल आये हैं हम, कि तेरे ख्यालों में भी नही आते ?
दिल को कागज समझ रखा है क्या.. आते हो, जलाते हो, चले जाते हो
दिल उसके इंतज़ार में डूबा है. जो किसी और की चाहत में डूबा है.
अपने रब के फैसले पर भला शक कैसे करुँ सजा दे रहा है अगर वो कुछ तो गुनाह रहा होगा..
मुझमें ही हौसला नहीं वरना .. छत का पंखा पुकारता है मुझे....
“वो रोए तो बहुत, पर मुझसे मूह मोड़ कर रोए, कोई मजबूरी होगी तो दिल तोड़ कर रोए
क्या इतने दूर निकल आये हैं हम, कि तेरे ख्यालों में भी नही आते ?
दिल को कागज समझ रखा है क्या.. आते हो, जलाते हो, चले जाते हो
दिल उसके इंतज़ार में डूबा है. जो किसी और की चाहत में डूबा है.
अपने रब के फैसले पर भला शक कैसे करुँ सजा दे रहा है अगर वो कुछ तो गुनाह रहा होगा..
मुझमें ही हौसला नहीं वरना .. छत का पंखा पुकारता है मुझे....