इतिहास गवाह है- 'खबर' हो या 'कबर' खोदते हमेशा अपने ही हैं|
जिनको मेरी फ़िक्र नहीं उनका अब से कोई ज़िक्र नहीं
जान ले लेता है वो एक छोटा सा पल भी, जब बेहिसाब प्यार के बाद वो कहे की हम कभी एक नहीं हो सकते..
मेरी याद क़यामत की तरह है एक दिन ज़रूर आएगी
डूबे हुओं को हमने बिठाया था अपनी कश्ती में यारो..... और फिर कश्ती का बोझ कहकर, हमे ही उतारा गया
सच को तमीज़ ही नहीं बात करने की, झूठ को देखो, कितना मीठा बोलता है....
इतिहास गवाह है- 'खबर' हो या 'कबर' खोदते हमेशा अपने ही हैं|
जिनको मेरी फ़िक्र नहीं उनका अब से कोई ज़िक्र नहीं
जान ले लेता है वो एक छोटा सा पल भी, जब बेहिसाब प्यार के बाद वो कहे की हम कभी एक नहीं हो सकते..
मेरी याद क़यामत की तरह है एक दिन ज़रूर आएगी
डूबे हुओं को हमने बिठाया था अपनी कश्ती में यारो..... और फिर कश्ती का बोझ कहकर, हमे ही उतारा गया
सच को तमीज़ ही नहीं बात करने की, झूठ को देखो, कितना मीठा बोलता है....