किस हक़ से माँगहु अपने हिस्से का वक़त आपसे, क्यूंकि न आप मेरे हो और न ही वक़त मेरा है
हमे देखकर..अनदेखा कर दिया उसने, बंद आंखों से पहचानने का, कभी दावा किया था जिसने
जब मिलो किसी से तो ज़रा दूर का रिश्ता रखना बहुत तड़पते हैं अक्सर सीने से लगने वाले
आंधी आती है, तो पेड़ से पत्ते टूट जाते है नया बाबू मिलते ही पुराने छूट जाते हैं
चारो और देख लिया मैंने ना मुझे मेरा कोई दिखा ना मेरे जैसा कोई दिखा।
जान लेने पे तुले हे दोनो मेरी..इश्क हार नही मानता..दिल बात नही मानता।
किस हक़ से माँगहु अपने हिस्से का वक़त आपसे, क्यूंकि न आप मेरे हो और न ही वक़त मेरा है
हमे देखकर..अनदेखा कर दिया उसने, बंद आंखों से पहचानने का, कभी दावा किया था जिसने
जब मिलो किसी से तो ज़रा दूर का रिश्ता रखना बहुत तड़पते हैं अक्सर सीने से लगने वाले
आंधी आती है, तो पेड़ से पत्ते टूट जाते है नया बाबू मिलते ही पुराने छूट जाते हैं
चारो और देख लिया मैंने ना मुझे मेरा कोई दिखा ना मेरे जैसा कोई दिखा।
जान लेने पे तुले हे दोनो मेरी..इश्क हार नही मानता..दिल बात नही मानता।