बहुत शोक था दुसरो को खुश रखने का होश तब आया जब खुद को अकेला पाया
युं ही हम दिल को साफ़ रखा करते थे…पता नही था की, ‘किमत चेहरों की होती है’ !
ज़रा सा खुश क्या होती हूँ किस्मत को बुरा लग जाता है
अकेली रात .. बोलती बहुत है लेकिन सुन वही सकता है जो खुद भी अकेला हो .
जब कोई आपकी नाराज़गी की फ़िक्र करना छोड़ दे तो समझ लेना रिश्ता ख़तम मजबूरी शुरू
जिस रात की कभी कोई सुबह नही होती हर रात उस रात का इंतेज़ार रहता है.......
बहुत शोक था दुसरो को खुश रखने का होश तब आया जब खुद को अकेला पाया
युं ही हम दिल को साफ़ रखा करते थे…पता नही था की, ‘किमत चेहरों की होती है’ !
ज़रा सा खुश क्या होती हूँ किस्मत को बुरा लग जाता है
अकेली रात .. बोलती बहुत है लेकिन सुन वही सकता है जो खुद भी अकेला हो .
जब कोई आपकी नाराज़गी की फ़िक्र करना छोड़ दे तो समझ लेना रिश्ता ख़तम मजबूरी शुरू
जिस रात की कभी कोई सुबह नही होती हर रात उस रात का इंतेज़ार रहता है.......