आज अश्क से आँखों में क्यों हैं आये हुए, गुजर गया है ज़माना तुझे भुलाये हुए।
जो आँसू आँख से अचानक निकल पड़ें, वजह उनकी ज़बान से बयां नहीं होती।
जो सूखी टहनियों में नमी बची है ना उसी को याद कहते हैं।
ला तेरे पैरों पर मरहम लगा दू, कुछ चोट तोह तुझे भी आई होगी मेरे दिल को ठोकर मारने में
वहाँ से पानी की एक बूँद भी न निकली, तमाम उम्र जिन आँखों को झील लिखते रहे।
कभी कभी बहुत सताता है यह सवाल मुझे, हम मिले ही क्यों थे, जब हमें मिलना ही नहीं था
आज अश्क से आँखों में क्यों हैं आये हुए, गुजर गया है ज़माना तुझे भुलाये हुए।
जो आँसू आँख से अचानक निकल पड़ें, वजह उनकी ज़बान से बयां नहीं होती।
जो सूखी टहनियों में नमी बची है ना उसी को याद कहते हैं।
ला तेरे पैरों पर मरहम लगा दू, कुछ चोट तोह तुझे भी आई होगी मेरे दिल को ठोकर मारने में
वहाँ से पानी की एक बूँद भी न निकली, तमाम उम्र जिन आँखों को झील लिखते रहे।
कभी कभी बहुत सताता है यह सवाल मुझे, हम मिले ही क्यों थे, जब हमें मिलना ही नहीं था