बेवफ़ाओं की महफ़िल लगेगी, आज ज़रा वक़्त पर आना ‘मेहमान-ए-ख़ास’ हो तुम…
मत पूछ कैसे गुज़र रही है ज़िन्दगी, उस दौर से गुज़र रही हूँ जो गुजरता ही नहीं
रूठा अगर तुझसे तो इस अंदाज से रूठूंगा, तेरे शहर की मिट्टी भी मेरे बजूद को तरसेगी.
कितने दर्दनाक थे वो मंजर जब हम बिछड़े थे उसने कहा था जीना भी नहीं और रोना भी नहीं.
जो मैं रूठ जाऊँ तो तुम मना लेना, कुछ न कहना बस सीने से लगा लेना।
काश एक ख़्वाहिश पूरी हो इबादत के बगैर, तुम आ कर गले लगा लो मुझे, मेरी इज़ाज़त के बगैर.
बेवफ़ाओं की महफ़िल लगेगी, आज ज़रा वक़्त पर आना ‘मेहमान-ए-ख़ास’ हो तुम…
मत पूछ कैसे गुज़र रही है ज़िन्दगी, उस दौर से गुज़र रही हूँ जो गुजरता ही नहीं
रूठा अगर तुझसे तो इस अंदाज से रूठूंगा, तेरे शहर की मिट्टी भी मेरे बजूद को तरसेगी.
कितने दर्दनाक थे वो मंजर जब हम बिछड़े थे उसने कहा था जीना भी नहीं और रोना भी नहीं.
जो मैं रूठ जाऊँ तो तुम मना लेना, कुछ न कहना बस सीने से लगा लेना।
काश एक ख़्वाहिश पूरी हो इबादत के बगैर, तुम आ कर गले लगा लो मुझे, मेरी इज़ाज़त के बगैर.