आज कल वो ? हमसे डिजिटल नफरत ? करते हैं, हमें ऑनलाइन देखते ही ऑफलाइन हो जाते हैं.
झूठ बोलते थे कितना, फिर भी सच्चे थे हम ये उन दिनों की बात है, जब बच्चे थे हम!
हमे जब नींद आएगी तो इस कदर सोएंगे के लोग रोएंगे हमे जगाने के लिए!
वो कहती है की बहुत मजबूरियां है मेरी, साफ़ शब्दों में खुद को “बेवफ़ा” नहीं कहती.
वो बोलते रहे हम सुनते रहे, जवाब आँखों में था वो जुबान में ढूंढते रहे.
हाथ की नब्ज़ काट बैठा हूँ, शायद तुम दिल से निकल जाओ ख़ून के ज़रिये.
आज कल वो ? हमसे डिजिटल नफरत ? करते हैं, हमें ऑनलाइन देखते ही ऑफलाइन हो जाते हैं.
झूठ बोलते थे कितना, फिर भी सच्चे थे हम ये उन दिनों की बात है, जब बच्चे थे हम!
हमे जब नींद आएगी तो इस कदर सोएंगे के लोग रोएंगे हमे जगाने के लिए!
वो कहती है की बहुत मजबूरियां है मेरी, साफ़ शब्दों में खुद को “बेवफ़ा” नहीं कहती.
वो बोलते रहे हम सुनते रहे, जवाब आँखों में था वो जुबान में ढूंढते रहे.
हाथ की नब्ज़ काट बैठा हूँ, शायद तुम दिल से निकल जाओ ख़ून के ज़रिये.