आज कल वो ? हमसे डिजिटल नफरत ? करते हैं, हमें ऑनलाइन देखते ही ऑफलाइन हो जाते हैं.
मोहब्बत किससे और कब हो जाये अदांजा नहीं होता, ये वो घर है, जिसका दरवाजा नहीं होता.
कुछ शिकवे ऐसे थे कि, खुद ही किये और खुद ही सुने!!
जी भर गया है तो बता दो हमें इनकार पसंद है इंतजार नहीं!
अब वफा की उम्मीद भी किस से करे भला मिटटी के बने लोग कागजो मे बिक जाते है।
मैं उस किस्मत का सबसे पसंदीदा खिलौना हूँ, वो रोज़ जोड़ती है मुझे फिर से तोड़ने के लिए….
आज कल वो ? हमसे डिजिटल नफरत ? करते हैं, हमें ऑनलाइन देखते ही ऑफलाइन हो जाते हैं.
मोहब्बत किससे और कब हो जाये अदांजा नहीं होता, ये वो घर है, जिसका दरवाजा नहीं होता.
कुछ शिकवे ऐसे थे कि, खुद ही किये और खुद ही सुने!!
जी भर गया है तो बता दो हमें इनकार पसंद है इंतजार नहीं!
अब वफा की उम्मीद भी किस से करे भला मिटटी के बने लोग कागजो मे बिक जाते है।
मैं उस किस्मत का सबसे पसंदीदा खिलौना हूँ, वो रोज़ जोड़ती है मुझे फिर से तोड़ने के लिए….