हक़ीक़त क्या है आँखों के सामने नजर आता है धोखे खाने से तजुर्बा अक़्सर बढ़ जाता है!
धोखा देना आसान होता है, लेकिन धोखा सहना आसान नहीं होता है.
बिन मागें जो मिल जाए वो है धोखा और फरेब, और जो मांगकर भी ना मिले वो है सच्चा इश्क….।
धोखा कभी गैरों से नहीं मिलता, विश्वास तो अपने तोड़ जाते है।
अर्ज़ किया है… कि… मेरी शायरी में अब भी दर्द की कमी है शायद तेरे धोखे का इंतज़ार है इस दिल को!
इंसान को धोखा कभी भी इंसान नहीं देता…! उसकी उम्मीदें देती हैं जो वो दूसरों से अपेक्षा करता है.!!
हक़ीक़त क्या है आँखों के सामने नजर आता है धोखे खाने से तजुर्बा अक़्सर बढ़ जाता है!
धोखा देना आसान होता है, लेकिन धोखा सहना आसान नहीं होता है.
बिन मागें जो मिल जाए वो है धोखा और फरेब, और जो मांगकर भी ना मिले वो है सच्चा इश्क….।
धोखा कभी गैरों से नहीं मिलता, विश्वास तो अपने तोड़ जाते है।
अर्ज़ किया है… कि… मेरी शायरी में अब भी दर्द की कमी है शायद तेरे धोखे का इंतज़ार है इस दिल को!
इंसान को धोखा कभी भी इंसान नहीं देता…! उसकी उम्मीदें देती हैं जो वो दूसरों से अपेक्षा करता है.!!