दो चार आँसू ही आते हैं पलकों के किनारे पे, वर्ना आँखों का समंदर गहरा बहुत है।
फिर आज आँसुओं में नहाई हुई है रात, शायद हमारी तरह ही सताई हुई है रात।
उपर वाला भी अपना आशिक है, इसिलीऐ तो किसिका होने नहि देता
निकल जाते हैं तब आँसू जब उनकी याद आती है, जमाना मुस्कुराता है मोहब्बत रूठ जाती है।
वो निभा रही थी मोहब्बत अच्छे से.. कभी इधर... कभी उधर..
टपक पड़ते हैं आँसू जब तुम्हारी याद आती है, ये वो बरसात है जिसका कोई मौसम नहीं होता।
दो चार आँसू ही आते हैं पलकों के किनारे पे, वर्ना आँखों का समंदर गहरा बहुत है।
फिर आज आँसुओं में नहाई हुई है रात, शायद हमारी तरह ही सताई हुई है रात।
उपर वाला भी अपना आशिक है, इसिलीऐ तो किसिका होने नहि देता
निकल जाते हैं तब आँसू जब उनकी याद आती है, जमाना मुस्कुराता है मोहब्बत रूठ जाती है।
वो निभा रही थी मोहब्बत अच्छे से.. कभी इधर... कभी उधर..
टपक पड़ते हैं आँसू जब तुम्हारी याद आती है, ये वो बरसात है जिसका कोई मौसम नहीं होता।