लफ्ज ढाई अक्षर ही थे.....कभी प्यार बन गए तो कभी जख्म.......
किसी को क्या बताएं कितने मजबूर हैं हम, चाहा है एक तुम्हें और तुम्ही से दूर है हम
बहुत याद आते हो तुम, दुआ करो मेरी यादाश्ति चली जाये
दो पल भी नहीं गुज़रते तुम्हारे बिन, ये ज़िन्दगी ना जाने कैसे गुज़ारेंगे!
गजब का हमदर्द था मेरा, जो दर्द के सिवा कुछ दे ना सका
ठोकर खाया हुआ दिल है...भीड से ज्यादा तन्हाई अच्छी लगती है....
लफ्ज ढाई अक्षर ही थे.....कभी प्यार बन गए तो कभी जख्म.......
किसी को क्या बताएं कितने मजबूर हैं हम, चाहा है एक तुम्हें और तुम्ही से दूर है हम
बहुत याद आते हो तुम, दुआ करो मेरी यादाश्ति चली जाये
दो पल भी नहीं गुज़रते तुम्हारे बिन, ये ज़िन्दगी ना जाने कैसे गुज़ारेंगे!
गजब का हमदर्द था मेरा, जो दर्द के सिवा कुछ दे ना सका
ठोकर खाया हुआ दिल है...भीड से ज्यादा तन्हाई अच्छी लगती है....