किताबों की तरह हैं हम भी….अल्फ़ाज़ से भरपूर, मगर ख़ामोश….!!

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आज परछाई से पूछ ही लिया, क्यों चलते हो.. मेरे साथ..उसने भी हंसके कहा, और कौन है...तेरे साथ !!

कैसे छोड दूं आखिर तुझसे मोहब्बत करना...तू मेरी किस्मत में ना सही.. दिल में तो है

हादसे कुछ दिल पे ऐसे हो गए, हम समुन्दर से भी गहरे हो गए

चले जाने दो उस बेवफ़ा को किसी और की बाहों में जो इतनी चाहत के बाद मेरा ना हुआ वो किसी और का क्या होगा

जिस्म तो फिर भी थक हार के सो जाता है....काश दिल का भी कोई बिस्तर होता.....

वो बोलते रहे, हम सुनते रहे - जबाब आँखों में था, वो लफ्जों मे ढूढते रहे

आज परछाई से पूछ ही लिया, क्यों चलते हो.. मेरे साथ..उसने भी हंसके कहा, और कौन है...तेरे साथ !!

कैसे छोड दूं आखिर तुझसे मोहब्बत करना...तू मेरी किस्मत में ना सही.. दिल में तो है

हादसे कुछ दिल पे ऐसे हो गए, हम समुन्दर से भी गहरे हो गए

चले जाने दो उस बेवफ़ा को किसी और की बाहों में जो इतनी चाहत के बाद मेरा ना हुआ वो किसी और का क्या होगा

जिस्म तो फिर भी थक हार के सो जाता है....काश दिल का भी कोई बिस्तर होता.....

वो बोलते रहे, हम सुनते रहे - जबाब आँखों में था, वो लफ्जों मे ढूढते रहे