कल तक थी जो जान, आज बन गयी अनजान.
निभा दिया उसने भी दस्तूर दुनिया का तो गिला कैसा पहचानता कौन है यहां मतलब निकल जाने के बाद...
इश्क़ में इतनी बेपरवाहियाँ भी ठीक नही हैं, बात हम नही करते ...तो तकल्लुफ तुम भी नही करते...!!
जिसकी सजा तुम हो, मुझे ऐसा कोई गुनाह करना है.
कुछ रुकी रुकी सी है ज़िन्दगी, कुछ चलते फिरते से है हम।
शाम नहीं पर बात वही. तू नहीं तो तेरी याद सही.
कल तक थी जो जान, आज बन गयी अनजान.
निभा दिया उसने भी दस्तूर दुनिया का तो गिला कैसा पहचानता कौन है यहां मतलब निकल जाने के बाद...
इश्क़ में इतनी बेपरवाहियाँ भी ठीक नही हैं, बात हम नही करते ...तो तकल्लुफ तुम भी नही करते...!!
जिसकी सजा तुम हो, मुझे ऐसा कोई गुनाह करना है.
कुछ रुकी रुकी सी है ज़िन्दगी, कुछ चलते फिरते से है हम।
शाम नहीं पर बात वही. तू नहीं तो तेरी याद सही.