क्यों बोझ हो जाते है वो झुके कंधे साहब जिनकर चढ़कर तुम कभी मेला देखा करते थे

क्यों बोझ हो जाते है वो झुके कंधे साहब जिनकर चढ़कर तुम कभी मेला देखा करते थे

Share:

More Like This

अपने ही लोग लूट लेते है, वरना गैरों को क्या मालूम कि दिल की दीवार कहाँ से कमजोर है।

जो लोग अन्दर से मर जाते है, अक्सर वही लोग दूसरो को जीना सिखाते है।

डूबे हुए को हमने बैठाया था अपनी नांव में यारों और, फिर नाँव का बोझ कहकर, हमें ही उतार दिया।

एक तरफा Emotions हमेशा दुख देते हैं, इसलिए ऐसे emotions को समय रहते नियंत्रित कर लेना चाहिए

कसूर किसी का भी हो मगर, आसूँ हमेशा बेक़सूर के ही निकलते हैं

थक कर ही बैठा हूँ, हार कर नहीं… सिर्फ बाजी हाथ से निकली है, जिन्दगी नहीं।

अपने ही लोग लूट लेते है, वरना गैरों को क्या मालूम कि दिल की दीवार कहाँ से कमजोर है।

जो लोग अन्दर से मर जाते है, अक्सर वही लोग दूसरो को जीना सिखाते है।

डूबे हुए को हमने बैठाया था अपनी नांव में यारों और, फिर नाँव का बोझ कहकर, हमें ही उतार दिया।

एक तरफा Emotions हमेशा दुख देते हैं, इसलिए ऐसे emotions को समय रहते नियंत्रित कर लेना चाहिए

कसूर किसी का भी हो मगर, आसूँ हमेशा बेक़सूर के ही निकलते हैं

थक कर ही बैठा हूँ, हार कर नहीं… सिर्फ बाजी हाथ से निकली है, जिन्दगी नहीं।