क्यों बोझ हो जाते है वो झुके कंधे साहब जिनकर चढ़कर तुम कभी मेला देखा करते थे

क्यों बोझ हो जाते है वो झुके कंधे साहब जिनकर चढ़कर तुम कभी मेला देखा करते थे

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थक कर ही बैठा हूँ, हार कर नहीं… सिर्फ बाजी हाथ से निकली है, जिन्दगी नहीं।

सफ़ल होने की तमन्ना मुझ में भी है, मगर गलत रास्तों से होकर जाऊं, इतनी भी जल्दी नहीं है.

घुस्सा आने पर चिल्लाने के लिए ताकत नहीं लगती, घुस्सा आने पर शांत बैठने पर ताकत ज़रूर लगती है।

इतना भी आसान नहीं होता अपनी जिन्दगी जी पाना, बहुत लोगो को खटकने लगते है… जब हम खुद को जीने लगते है।

जब बच्चे थे तब अधूरे एहसास, टूटे सपने, अधूरे होमवर्क और टूटे खिलौने सब अच्छे लगते थे.

किसी के दूर जाने से उतनी तकलीफ कभी नहीं होती है जितनी तकलीफ तब होती है जब कोई पास होकर भी हमसे दूरियाँ बना लें।

थक कर ही बैठा हूँ, हार कर नहीं… सिर्फ बाजी हाथ से निकली है, जिन्दगी नहीं।

सफ़ल होने की तमन्ना मुझ में भी है, मगर गलत रास्तों से होकर जाऊं, इतनी भी जल्दी नहीं है.

घुस्सा आने पर चिल्लाने के लिए ताकत नहीं लगती, घुस्सा आने पर शांत बैठने पर ताकत ज़रूर लगती है।

इतना भी आसान नहीं होता अपनी जिन्दगी जी पाना, बहुत लोगो को खटकने लगते है… जब हम खुद को जीने लगते है।

जब बच्चे थे तब अधूरे एहसास, टूटे सपने, अधूरे होमवर्क और टूटे खिलौने सब अच्छे लगते थे.

किसी के दूर जाने से उतनी तकलीफ कभी नहीं होती है जितनी तकलीफ तब होती है जब कोई पास होकर भी हमसे दूरियाँ बना लें।