डाल कर...आदत बेपनाह मोहब्बत की...अब वो कहते है...कि...समझा करो वक़्त नही है...

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चलो बिखरने देते है जिंदगी को सँभालने की भी हद होती है

ज़िन्दगी से भला क्या शिकायत करें बस जिसे चाहा उसने समझा ही नही

तेरी मुस्कान, तेरा लहज़ा, और तेरे मासूम से अल्फाज़..और क्या कहूँ... बस बहुत याद आते हो तुम..

काश तू सिर्फ मेरे होता या फिर मिला ही ना होता

याद हैं हमको अपने तीनो गुनाह ! एक तो मोहबत कर ली, दूसरा तुमसे कर ली और तीसरा बेपनाह कर ली...!

दास्तां सुनाऊं और मज़ाक़ बन जाऊँ बेहतर है मुस्कुराऊं और ख़ामोश रह जाऊँ

चलो बिखरने देते है जिंदगी को सँभालने की भी हद होती है

ज़िन्दगी से भला क्या शिकायत करें बस जिसे चाहा उसने समझा ही नही

तेरी मुस्कान, तेरा लहज़ा, और तेरे मासूम से अल्फाज़..और क्या कहूँ... बस बहुत याद आते हो तुम..

काश तू सिर्फ मेरे होता या फिर मिला ही ना होता

याद हैं हमको अपने तीनो गुनाह ! एक तो मोहबत कर ली, दूसरा तुमसे कर ली और तीसरा बेपनाह कर ली...!

दास्तां सुनाऊं और मज़ाक़ बन जाऊँ बेहतर है मुस्कुराऊं और ख़ामोश रह जाऊँ