जमाना क्या लुटेगा हमारी खुशियों को, हम तो खुद खुशियाँ दूसरों पर लुटा कर जीते हैं
हमारी बराबरी करने जाओगे तो बिक जाओगे
समझा दो उन समझदारो को, की कातिलो की गली में भी दहशत हमारे ही नाम की है !!
सबर कर अपना किस्सा नहीं कहानी हैं
पैसा "हैसियत" बदल सकता है, "औकात" नहीं.
फर्क तोह अपनी अपनी सोच मै है जनाब वरना दोस्ती भी मोहब्बत सेह कम नहीं होती
जमाना क्या लुटेगा हमारी खुशियों को, हम तो खुद खुशियाँ दूसरों पर लुटा कर जीते हैं
हमारी बराबरी करने जाओगे तो बिक जाओगे
समझा दो उन समझदारो को, की कातिलो की गली में भी दहशत हमारे ही नाम की है !!
सबर कर अपना किस्सा नहीं कहानी हैं
पैसा "हैसियत" बदल सकता है, "औकात" नहीं.
फर्क तोह अपनी अपनी सोच मै है जनाब वरना दोस्ती भी मोहब्बत सेह कम नहीं होती