किस घुमान मैं हो मोहतरमा भुला दिया हमने तुझे
हम बात ख़त्म नहीं करते कहानी ख़त्म करते हैं
तू मोहब्बत थी इसलिए तुझे भाव दिया, वरना इग्नोर करने में मैंने पीएचडी की है
तुझे शिकायत है कि मुझे बदल दिया वक़्त ने कभी खुद से भी तो सवाल कर क्या तू वही है
हमारी खामोशी को हमारा घमंड ना समझो बस कुछ ठोकरे ऐसी लगी है कि बोलने को मन नहीं करता.
नाराज़ है तो नाराज़ ही रहने दो किसीके पैरों में गिरकर जिना हमें नहीं आता
किस घुमान मैं हो मोहतरमा भुला दिया हमने तुझे
हम बात ख़त्म नहीं करते कहानी ख़त्म करते हैं
तू मोहब्बत थी इसलिए तुझे भाव दिया, वरना इग्नोर करने में मैंने पीएचडी की है
तुझे शिकायत है कि मुझे बदल दिया वक़्त ने कभी खुद से भी तो सवाल कर क्या तू वही है
हमारी खामोशी को हमारा घमंड ना समझो बस कुछ ठोकरे ऐसी लगी है कि बोलने को मन नहीं करता.
नाराज़ है तो नाराज़ ही रहने दो किसीके पैरों में गिरकर जिना हमें नहीं आता