डूबे हुओं को हमने बिठाया था अपनी कश्ती में यारो..... और फिर कश्ती का बोझ कहकर, हमे ही उतारा गया
जब ऑंसू गिरने बंद हो जाये तोह तकलीफ गुस्सा बन क बाहर अति है
पता नहीं क्यों मोहब्बत उस शख्स से हो जाती है जिसे हमारी बिलकुल क़दर नहीं होती न हमारी मोहब्बत की न हमारे एहसास की
कोई तो होगा टूटा हुआ मेरी तरह ही जो, जुड़ने की ख्वाहिश लिए जी रहा होगा अकेला कही.याद वो नहीं जो अकेले में आये, याद वो है जो महफिल में आये और अकेला कर जाए ||
जब मिलती ही नहीं...तो मोहब्बत होती क्यूँ है...!!!
बुरा हमें भी लगता है बस तुम्हे एहसास नहीं होने देते
डूबे हुओं को हमने बिठाया था अपनी कश्ती में यारो..... और फिर कश्ती का बोझ कहकर, हमे ही उतारा गया
जब ऑंसू गिरने बंद हो जाये तोह तकलीफ गुस्सा बन क बाहर अति है
पता नहीं क्यों मोहब्बत उस शख्स से हो जाती है जिसे हमारी बिलकुल क़दर नहीं होती न हमारी मोहब्बत की न हमारे एहसास की
कोई तो होगा टूटा हुआ मेरी तरह ही जो, जुड़ने की ख्वाहिश लिए जी रहा होगा अकेला कही.याद वो नहीं जो अकेले में आये, याद वो है जो महफिल में आये और अकेला कर जाए ||
जब मिलती ही नहीं...तो मोहब्बत होती क्यूँ है...!!!
बुरा हमें भी लगता है बस तुम्हे एहसास नहीं होने देते