पत्थर सा बदनाम हूँ साहब, अपने शहर में आईना कहीं भी टूटे नाम मेरा ही आता है
जो मज़ा अपनी पहचान बनाने मे है.. वो किसी और की परछाई बनने मे कहा..!
मैं तोह पहले से ही बिगड़ा हुआ हु तुम जैसे मेरा क्या बिगाड़ लोगे
जिन्हे हम ज़हर लगते हे वो हमें खा कर मर जाये
जो मेरा होता है उस पर किसी का हक़ तो क्या नज़र तक बर्दाश्त नहीं करती मै
पल पल रंग बदलती है दुनिया और लोग पूछते है होली कब है |
पत्थर सा बदनाम हूँ साहब, अपने शहर में आईना कहीं भी टूटे नाम मेरा ही आता है
जो मज़ा अपनी पहचान बनाने मे है.. वो किसी और की परछाई बनने मे कहा..!
मैं तोह पहले से ही बिगड़ा हुआ हु तुम जैसे मेरा क्या बिगाड़ लोगे
जिन्हे हम ज़हर लगते हे वो हमें खा कर मर जाये
जो मेरा होता है उस पर किसी का हक़ तो क्या नज़र तक बर्दाश्त नहीं करती मै
पल पल रंग बदलती है दुनिया और लोग पूछते है होली कब है |