जमाना क्या लुटेगा हमारी खुशियों को, हम तो खुद खुशियाँ दूसरों पर लुटा कर जीते हैं
मेरे बारे में इतना मत सोचना , दिल में आता हु , समज में नही
हमें हद में रहना पसंद है और लोग उसे गरूर समझते हैं
झुको केवल उतना ही जितना सही हो, बेवजह झुकना केबल दुसरो के अहम् को बढ़ावा देता है
पैसा "हैसियत" बदल सकता है, "औकात" नहीं.
हम अपनी इस अदा पर थोड़ा गुरूर करते हैं, किसी से प्यार हो या नफरत भरपूर करते हैं
जमाना क्या लुटेगा हमारी खुशियों को, हम तो खुद खुशियाँ दूसरों पर लुटा कर जीते हैं
मेरे बारे में इतना मत सोचना , दिल में आता हु , समज में नही
हमें हद में रहना पसंद है और लोग उसे गरूर समझते हैं
झुको केवल उतना ही जितना सही हो, बेवजह झुकना केबल दुसरो के अहम् को बढ़ावा देता है
पैसा "हैसियत" बदल सकता है, "औकात" नहीं.
हम अपनी इस अदा पर थोड़ा गुरूर करते हैं, किसी से प्यार हो या नफरत भरपूर करते हैं