हक़ से दे तो तेरी “नफरत” भी सर आँखों पर, खैरात में तो तेरी “मोहब्बत” भी मंजूर नहीं…!
पत्थर सा बदनाम हूँ साहब, अपने शहर में आईना कहीं भी टूटे नाम मेरा ही आता है
तंग नहीं करते हम उन्हें आजकल, यह बात भी उन्हें तंग करती है.
ये तो सच है क़ि तुम्हे चाहने वाले बहुत होंगे पर मेरी भी ज़िद है कि मुझे सिर्फ तुम चाहो
ज़िद्दी हु गुस्से वाला हु बद्तमीज़ हु बेपरवाह भी हु लेकिन मेने कभी किसी को धोखा नहीं दिया
फर्क है दोस्ती और मोहब्बत में बरसों बाद मिलने पर मोहब्बत नजरें चुरा लेती है और दोस्ती गले लगा लेती हैं
हक़ से दे तो तेरी “नफरत” भी सर आँखों पर, खैरात में तो तेरी “मोहब्बत” भी मंजूर नहीं…!
पत्थर सा बदनाम हूँ साहब, अपने शहर में आईना कहीं भी टूटे नाम मेरा ही आता है
तंग नहीं करते हम उन्हें आजकल, यह बात भी उन्हें तंग करती है.
ये तो सच है क़ि तुम्हे चाहने वाले बहुत होंगे पर मेरी भी ज़िद है कि मुझे सिर्फ तुम चाहो
ज़िद्दी हु गुस्से वाला हु बद्तमीज़ हु बेपरवाह भी हु लेकिन मेने कभी किसी को धोखा नहीं दिया
फर्क है दोस्ती और मोहब्बत में बरसों बाद मिलने पर मोहब्बत नजरें चुरा लेती है और दोस्ती गले लगा लेती हैं